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हमारी टेक्नोलॉजी मस्क के रॉकेट से अलग, ज्यादा किफायती और कारगर… जानिए कैसे | ISRO’s RLV landing experiment successful | know how it will change India’s space sector


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बेंगलुरु2 घंटे पहले

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इंडियन एयरफोर्स के चिनूक हेलिकॉप्टर से RLV को 4.5 किमी की ऊंचाई तक ले जाया गया। फिर लॉन्च व्हीकल को रिलीज कर दिया गया।

खबर की शुरुआत एक तस्वीर से… जो इंडियन इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन यानी ISRO की बड़ी कामयाबी को दिखाती है।

रविवार यानी 2 अप्रैल 2023 को इसरो ने अपने रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल की सक्सेसफुली लैंडिंग कराई। दुनिया में पहली बार, एक विंग वाली बॉडी को हेलिकॉप्टर से 4.5 किमी की ऊंचाई तक ले जाया गया है और रनवे पर ऑटोनॉमस लैंडिंग के लिए छोड़ा गया है।

खबर में आगे बढ़ने से पहले एक छोटी सी कहानी पढ़िए…

तारीख थी 16 जनवरी 2003। अमेरिका के कैनेडी स्पेस सेंटर के लॉन्च पैड 39-A से स्पेस शटल कोलंबिया ने ईस्टर्न टाइम सुबह 10 बजकर 39 मिनट पर उड़ान भरी। शटल में भारत की कल्पना चावला समेत 7 एस्ट्रोनॉट सवार थे।

16 दिन तक स्पेस में एक्सपेरिमेंट करने के बाद 1 फरवरी 2003 को स्पेस शटल को पृथ्वी पर लौटना था, लेकिन पृथ्वी के एटमॉस्फियर में एंट्री करते वक्त शटल जलकर खाक हो गई।

हादसे का कारण एक फोम का टुकड़ा था, जो लॉन्च के 82 सेकेंड बाद एक्सटर्नल टैंक से निकलकर शटल के लेफ्ट विंग से टकरा गया था।

पृथ्वी के एटमॉस्फियर में एंट्री करते वक्त स्पेस शटल जलकर खाक हो गया था

पृथ्वी के एटमॉस्फियर में एंट्री करते वक्त स्पेस शटल जलकर खाक हो गया था

नासा की ये स्पेस शटल टेक्नोलॉजी दुनिया की पहली रीयूजेबल स्पेसक्राफ्ट टेक्नोलॉजी है। ये इतिहास में पहला अंतरिक्ष यान भी है जो बड़े सैटेलाइट को ऑर्बिट में और ऑर्बिट से बाहर ले जा सकता था। नासा के पास ऐसे 6 स्पेस शटल थे। चैलेंजर, कोलंबिया, अटलांटिस, डिस्कवरी, एंडेवर और एंटरप्राइज। चैलेंजर और कोलंबिया हादसे का शिकार हो गए, बाकी स्पेसक्राफ्ट म्यूजियम में रखे हुए हैं। एंटरप्राइज ने कभी भी उड़ान नहीं भरी।

नासा का पहला स्पेस शटल मिशन 1981 में लॉन्च किया गया था। आखिरी मिशन साल 2011 में लॉन्च हुआ था। इसके बाद नासा स्पेस स्टेशन तक एस्ट्रोनॉट को भेजने के लिए रूस के सोयूज स्पेस क्राफ्ट का इस्तेमाल करने लगा। हालांकि, अब प्राइवेट स्पेस एजेंसी स्पेसएक्स के स्पेसक्राफ्ट से एस्ट्रोनॉट को स्पेस स्टेशन पहुंचाया और वापस लाया जाता है।

स्पेस शटल में तीन मेजर कंपोनेंट होते हैं। ऑर्बिटर जिसमें चालक दल होता है। एक बड़ा एक्सटर्नल टैंक जिसमें फ्यूल रहता है। दो सॉलिड रॉकेट बूस्टर जो उड़ान के पहले दो मिनट के दौरान शटल को लिफ्ट प्रदान करते हैं।

स्पेस शटल में तीन मेजर कंपोनेंट होते हैं। ऑर्बिटर जिसमें चालक दल होता है। एक बड़ा एक्सटर्नल टैंक जिसमें फ्यूल रहता है। दो सॉलिड रॉकेट बूस्टर जो उड़ान के पहले दो मिनट के दौरान शटल को लिफ्ट प्रदान करते हैं।

नासा के स्पेस शटल की तरह इसरो का RLV
ISRO का रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) नासा के स्पेस शटल की ही तरह है। लगभग 2030 तक पूरा होने पर, यह विंग वाला स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी की निचली कक्षा में 10,000 किलोग्राम से ज्यादा वजन ले जाने में सक्षम होगा। सैटेलाइट को बेहद कम कीमत पर ऑर्बिट में स्थापित किया जा सकेगा। ऐसे में यहां हम रीयूजेबल रॉकेट टेक्नोलॉजी के साथ इसरो के इस मिशन के बारे में बता रहे हैं…

रीयूजेबल टेक्नोलॉजी समझें…
किसी भी रॉकेट मिशन में 2 बेसिक चीजें होती है। रॉकेट और उस पर लगा स्पेसक्राफ्ट। रॉकेट का काम स्पेसक्राफ्ट को अंतरिक्ष में पहुंचाना होता है। अपने काम को करने के बाद रॉकेट को आम तौर पर समुद्र में गिरा दिया जाता है। यानी इसका दोबारा इस्तेमाल नहीं होता। लंबे समय तक पूरी दुनिया में इसी तरह से मिशन को अंजाम दिया जाता था। यही पर एंट्री होती है रियूजेबल रॉकेट की।

रीयूजेबल रॉकेट के पीछे का आइडिया स्पेसक्राफ्ट को लॉन्च करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अल्ट्रा-एक्सपेंसिव रॉकेट बूस्टर को रिकवर करना है। ताकि, फ्यूल भरने के बाद इनका फिर से इस्तेमाल किया जा सके। दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने सबसे पहले 2011 में इस पर काम करना शुरू किया था। 2015 में मस्क ने फॉल्कन 9 रॉकेट तैयार कर लिया जो रियूजेबल था।

एलन मस्क ने 2015 में अपने फॉल्कन 9 रॉकेट को लैंड कराने में सफलता हासिल की थी।

एलन मस्क ने 2015 में अपने फॉल्कन 9 रॉकेट को लैंड कराने में सफलता हासिल की थी।

इससे मिशन की कॉस्ट काफी कम हो गई। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आप नई दिल्ली से न्यूयॉर्क का सफर एक प्लेन में तय कर रहे हैं, लेकिन ये प्लेन एक ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम करता है जिसका इस्तेमाल केवल एक बार किया जा सकता हो। सोचिए इससे प्लेन का सफर कितना महंगा हो जाता, क्योंकि हर बार नई दिल्ली से न्यूयॉर्क जाने के लिए नया प्लेन बनाना पड़ता।

अब इसरो की टेक्नोलॉजी को समझें….
इसरो का रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) स्पेसएक्स से बिल्कुल अलग है। मिशन के दौरान स्पेसएक्स रॉकेट के निचले हिस्से को बचाता है, जबकि इसरो रॉकेट के ऊपरी हिस्से को बचाएगा जो ज्यादा जटिल होता है। इसे रिकवर करने से ज्यादा पैसों की बचत होगी। ये सैटेलाइट को स्पेस में छोड़ने के बाद वापस लौट आएगा। इसरो का स्पेसक्रॉफ्ट ऑटोनॉमस लैंडिंग कर सकता है।

इसरो का RLV लैंडिंग एक्सपेरिमेंट सफल
ISRO अपने रियूजेबल लॉन्च व्हीकल पर लंबे समय से काम कर रहा है। ये अभी अपने इनिशियल स्टेज में है। रविवार यानी 2 अप्रैल 2023 को इसरो ने अपने इस व्हीकल का ऑटोनॉमस लैंडिंग एक्सपेरिमेंट किया। ऑटोनॉमस लैंडिंग यानी स्पेसक्राफ्ट का बिना किसी की मदद से लैंड कर सकना। ये एक्सपेरिमेंट पूरी तरह से सक्सेसफुल रहा।

RLV लैंडिंग एक्सपेरिमेंट की मिशन प्रोफाइल। सोर्स: इसरो

RLV लैंडिंग एक्सपेरिमेंट की मिशन प्रोफाइल। सोर्स: इसरो

इंडियन एयरफोर्स के चिनूक हेलिकॉप्टर से RLV को सुबह 7 बजकर 10 मिनट पर 4.5 किमी की ऊंचाई तक ले जाया गया। इसके बाद वहां से लॉन्च व्हीकल को रिलीज कर दिया गया। RLV का रिलीज ऑटोनॉमस था। इसने लैंडिंग के लिए इंटीग्रेटेड नेविगेशन, गाइडेंस और कंट्रोल सिस्टम का इस्तेमाल किया। सुबह 7:40 बजे व्हीकल ने एयरस्ट्रिप पर ऑटोनॉमस लैंडिंग पूरी की।

सुबह 7:40 बजे इसरो के RLV-TD ने एयरस्ट्रिप पर ऑटोनॉमस लैंडिंग पूरी की।

सुबह 7:40 बजे इसरो के RLV-TD ने एयरस्ट्रिप पर ऑटोनॉमस लैंडिंग पूरी की।

स्पेस एजेंसी का दावा है दुनिया में पहली बार, एक विंग वाली बॉडी को हेलिकॉप्टर से 4.5 किमी की ऊंचाई तक ले जाया गया है और रनवे पर ऑटोनॉमस लैंडिंग के लिए छोड़ा गया है। RLV-TD में एक फ्यूजलेज स्ट्रेट बॉडी, एक नोज कैप, डबल डेल्टा विंग्स और ट्विन वर्टिकल टेल्स हैं। इसकी लंबाई 6.5 मीटर और चौड़ाई 3.6 मीटर है।

विंग्ड स्पेस शटल पर क्यों काम कर रहा इसरो?
1980 के दशक में अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने दुनिया का पहला विंग्ड स्पेस शटल लॉन्च किया था। इसका नाम कोलंबिया था। नासा के पास ऐसे कुल 6 स्पेस शटल थे। हादसों के बाद 2011 में नासा ने इन शटल्स को रिटायर कर दिया। रूस ने भी बुरान नाम से अपनी रीयूजेबल स्पेस शटल टेक्नोलॉजी डेवलप की थी, लेकिन कुछ ही मिशन के बाद इसे बंद कर दिया गया।

ऐसे में सवाल उठता है कि है कि जब अमेरिका और रूस विंग्ड स्पेस शटल पर काम बंद कर चुके हैं तो इसरो इस पर काम क्यों कर रहा है? स्पेस टेक्नोलॉजी के कुछ एक्सपर्ट कहते हैं कि अमेरिका और रूस की जो टेक्नोलॉजी थी वो 20वीं सदी की थी, यानी पुरानी टेक्नोलॉजी। इसरो जिस टेक्नोलॉजी से विंग्ड स्पेस शटल बना रहा है वो 21वीं सदी की है। ऐसे में इसरो का शटल अमेरिका-रूस के शटल की तुलना में एडवांस होगा।

इसरो को रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल से क्या फायदा होगा?
रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल से इसरो को स्पेस में लॉ-कॉस्ट एक्सेस मिलेगा। यानी स्पेस में ट्रैवल करना सस्ता हो जाएगा। सैटेलाइट को कम कीमत पर लॉन्च किया जा सकेगा। ये भी कयास लगाए जा रहे हैं कि इस व्हीकल की मदद से ऑर्बिट में खराब हुए सैटेलाइट को डेस्ट्रॉय करने के बजाय रिपेयर किया जा सकेगा। इसके अलावा जीरो ग्रैविटी में बायोलॉजी और फार्मा से जुड़े रिसर्च करना आसान हो जाएगा।

इसरो का व्हीकल कब तक तैयार हो जाएगा?
इसरो ने सबसे पहले मई 2016 में इसकी टेस्टिंग की थी। इसका नाम हाइपरसोनिक फ्लाइट एक्सपेरिमेंट (HEX) था। HEX मिशन में इसरो ने अपने विंग वाले व्हीकल RLV-TD की रि-एंट्री को डेमॉन्सट्रेट किया था। अब लैंडिंग एक्सपेरिमेंट यानी LEX को भी पूरा कर लिया गया है। आने वाले दिनों में रिटर्न टु फ्लाइट एक्सपेरिमेंट (REX) और स्क्रैमजेट प्रपल्शन एक्सपेरिमेंट (SPEX) को अंजाम दिया जाएगा।

ऐसे में एक्सपर्ट उम्मीद जता रहे हैं कि इसरो का व्हीकल 2030 के दशक में उड़ान भर पाएगा। भविष्य में इस व्हीकल को भारत के रियूजेबल टू-स्टेज ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल का पहला स्टेज बनने के लिए स्केल किया जाएगा। इसरो के अनुसार RLV-TD का कॉन्फिगरेशन एक एयरक्राफ्ट के समान है और लॉन्च व्हीकल और एयरक्राफ्ट दोनों की कॉम्प्लेक्सिटी को कंबाइन करता है।

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