Thursday, October 28, 2021
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Anurag anant hindi poems podcast pooja prasad pur


युवा कवि अनुराग अनंत (Anurag Anant) की कविताओं में भी यह प्रेम आता रहा है. लेकिन इस प्रेम की दृष्टि और उसका कथ्य अनोखा है.


प्रेम एक ऐसा विषय है जो हर कवि की कविताओं में सहज ही आ जाता है. युवा कवि अनुराग अनंत की कविताओं में भी यह प्रेम आता रहा है. लेकिन इस प्रेम की दृष्टि और उसका कथ्य अनोखा है. जीवन में सबकुछ पा लेने के बाद भी अगर आपके पास प्रेम नहीं है न, तो आपकी तमाम अमीरी अचानक बेहद गरीबी में तब्दील होने लगती है…

सब कुछ होने के बाद भी
अगर नहीं है तुम्हारे पास
इस भरी-पूरी दुनिया में
किसी लड़की की प्रतीक्षारत आंखें
उसकी धड़कती हुई छाती की शरणस्थली
उसकी उलझी हुई बातों की नदी
और उसकी निष्काम मुस्कान का सूर्य
तो तुम सम्पूर्ण पृथ्वी जीतने के बाद भी हार जाओगे

अगर किसी लड़की के स्वप्न में
उसकी स्वांस में
और उसके विश्वास में नहीं बना सके तुम घर
तो इस सम्पूर्ण पृथ्वी को अपना घर बना लेने के बाद भी
बेघर ही रहोगे तुम

अगर टूट कर नहीं चाहती तुम्हें कोई लड़की
अगर तुम्हारे बारे में सोचते हुए
हँसने-रोने नहीं लगती उसकी आंखें
अगर किसी लड़की के ख़्याल में नहीं बोए तुमने सूरजमुखी के फूल
तो सम्पूर्ण पृथ्वी का प्रेम पाने के बाद भी
तुम अभागे ही रहोगे

अगर नहीं देख सकते तुम दुनिया
प्रेम में गर्दन तक धँसी किसी लड़की की नज़र से
तो यक़ीन मानों
सारी पृथ्वी देख लेने के बाद भी तुम अन्धे ही रहोगे

यदि नहीं है कोई लड़की
जो कहती हो तुम्हें अपना आधा हिस्सा
तो विश्वास करो अधूरे ही रहोगे तुम

नमस्कार दोस्तो, न्यूज 18 हिंदी के विशेष पॉडकास्ट में मैं पूजा प्रसाद आपका स्वागत करती हूं. आज मैं आपसे बांच रही हूं अनुराग अनंत की कविताएं. काफी संक्षेप सी एक बातचीत में जब मैंने उनसे पूछा कि आप कविता लिखते क्यों हैं… तो उन्होंने कहा- मेरे लिए कविता एक प्रश्न है. एक सवाल जो आपसे आपके अनुभव पूछता है. आप अपने अनुभव दर्ज़ करते हैं और कविता हासिल में मिलती है. मेरे अनुभव दृश्य के अनुभव नहीं हैं. दृश्य के पार के अनुभव हैं. घटना के पार जो घटना को निर्धारित करने वाले कारण हैं, वे मुझे ज़्यादा आकर्षित करते हैं. वे कारण दृश्य में नहीं होते पर दृश्य उन्हीं से संचालित हो रहा होता है. दृश्य के पार देखने की दृष्टि ही तो दर्शन है. और यही दर्शन आपको निजी काव्य दर्शन देता है. कम से कम मेरे लिए तो यही सत्य है.

वाकई, अनुराग की कविताओं में कई बार वह भी दिखता है जो ‘दृश्य के पार का अनुभव है’. ऐसी ही उनकी एक कविता है – खून में कांच बह रहा है…

दुनिया जब दिल की बात करती है
उस वक्त मुझे सिर्फ सन्नाटा सुनाई देता है
और मैं रोना चाहता हूँ
पर हँस पड़ता हूँ
चुप रहने की फ़िराक में कुछ कह पड़ता हूँ
पर क्या ?
पता नहीं
शायद अपना आधा नाम
और तुम्हारा पूरा पता

हर शाम काँच से सारे शब्द टूट जाते हैं
और मैं उन्हें खून के घूँट के साथ पी जाता हूँ
दूर रेडियो पर कोई प्यार का गीत बज रहा होता है
और मैं कुछ याद करने की कोशिश में सब कुछ भूल जाता हूँ

एक बात तुम्हें बताता हूँ, तुम सबको बता देना
मेरी आत्मा तक सबकुछ छिल जाता है
जब प्यार जैसा कोई शब्द मेरे भीतर जाता है
मैं रोना चाहता हूँ
पर हँस पड़ता हूँ
जैसे मानो मेरे भीतर बहता हुआ लहू
किसी का किया कोई बेहद भद्दा मज़ाक हो

जो हवा मेरे आस-पास है
वो मुझसे धीरे से कहती है
कि मेरा दिल एक बंद बक्सा है
जिसमें कुछ नहीं है
सिवाय एक ज़ख़्मी सूरज
और बहुत सारे अँधेरे के

यादों की परछाइयाँ भी हैं वहाँ
पर उनका होना
न होने को ज्यादा प्रभावित नहीं करता

वहाँ कोई आदमी नहीं है
पर आदमियों के नामों की आहटें हैं
जो रह-रह कर धड़कती हैं
मेरे सीने की धड़कनों की लय पर

आईने में कुछ साफ़ नहीं दीखता
मैं हूँ या तुम
या फिर कोई तीसरा
जिसकी शक्ल हम दोनों से मिलती है

आईना मुझे तोड़ देता है
और मैं बिखर जाता हूँ
जैसे किसी ने बेर खा कर
गिठलियां बिखेर दी हों फर्श पर
हर गिठली में मैं हूँ
और मेरा दर्द है
जिसके सिरहाने बैठ कर रात, रात भर रुदाली गाती है
और मैं उसे देखता रहता हूँ
जैसे कोई बच्चा इन्द्रधनुष देखता है

दिल की दिवार पर एक बरगद उग आया है
जिसकी जड़ें तुम्हारी आँखों में समाई हैं
तुम जब आँखें बंद करती हो
बरगद की शाख पर टंगी
मेरी तस्वीर का दम घुटने लगता है

दुनिया और तुम
दो परस्पर दूर जाते हुए बिंदु हो
और मैं
दुनिया और तुम्हारे बीच खिंचता हुआ बिजली का तार
मैं ठहरा खड़ा हूँ
और मेरे भीतर से बिजलियाँ दौड़ रही हैं
मेरी आँखों में अँधेरा भरा हुआ है
और खून में कांच के टुकड़े बह रहे हैं

मैं किसी जख़्मी कविता की तरह हो गया हूँ
और प्यास में लिथड़ा हुआ
खुद से कहीं दूर पड़ा हूँ

अनुराग इलाहाबाद के रहनेवाले हैं और फिलहाल बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ से पत्रकारिता में पीएचडी कर रहे हैं, लेकिन इनकी कविताओं में खबरों की सी सपाटबयानी नहीं है, बल्कि इनमें जिरह है, कभी खुद से तो कभी अपने आसपास से. कुछ कविताएं आत्मस्वीकृति की तरह भी सामने आती लगती हैं. आइए सुनें अगली कविता – कवि, पुरुष और छली गई स्त्रियां!!

तुम्हारी देह के आगे कोई शब्द ही नहीं मिलता

मेरा पुरुष मेरे कवि की बाधा है
और मेरा कवि मेरे पुरुष की बाधा
हम दोनों एक दूसरे को रोकते हुए आगे बढ़ रहे हैं
बढ़ते हुए लड़ रहे हैं
लड़ते हुए बढ़ रहे हैं

मेरे जीवन में जितनी भी स्त्रियां थीं
सबको छला मेरे पुरुष ने
कभी राम की मुद्रा में
कभी बुद्ध की तरह
कभी कभी गांधी और मोदी की तरह भी

हर नायक के नेपथ्य में एक छली गई स्त्री होती है
स्त्रियों को छल कर ही बनते हैं नायक

मेरा कवि सभी छली गई स्त्रियों को तिनकों की तरह बीनता है
और घोंसला बना कर चिड़िया की तरह रहता है
उनकी पीड़ा मेरे आकाश में बादलों की तरह बरसती है
और मैं भीग जाता हूँ कविताओं के द्रव से

हर कवि के आगे आगे चलती है एक छली गई स्त्री
छली गई स्त्रियों के नेतृत्व में ही चलता है कवि

कविता दरअसल एक छली गई स्त्री है
जो भाषा के भीतर अपना एक गाँव बसाती है
और जो कोई भी उससे हो कर गुजरता है
उसके पाँव में अपने रक्त का आलता लगा देती है
इस तरह कविता से गुजरने वाले मनुष्य को
कविता थोड़ा सा स्त्री बना देती है

कविताओं में बहस करते हुए रचनाकार जाने अनजाने अपना काव्य दर्शन भी पेश कर रहा होता है, अनुराग अनंत की ऐसी ही कविता है –
तीसरा विकल्प

एक अदृश्य दुःख
मेरे जीवन के हर दृश्य में उपस्थित रहा
औरों के लिए ओझल
मेरे लिए प्रत्यक्ष
साक्षात, समक्ष

अदृश्य की सत्ता दृश्य से बड़ी होती है
जैसे ईश्वर सब जगह विद्यमान है
सर्वशक्तिशाली होने के मुहावरे के साथ
सरकार भी सब जगह है
मेरे और तुम्हारे बीच भी

देह में हृदय नहीं दिखता
पर होता तो है ही न
पानी में प्यास नहीं दिखती
पर होती तो है ही न
वायु में स्वांस नहीं दिखती
पर होती तो है ही न
उसी तरह प्रत्येक दृश्य में दुःख नहीं दिखता
पर होता तो है ही न

मछली को चारा दिखता है
काँटा नहीं
चिड़िया को दाना दिखता है
जाल नहीं
मनुष्य को मनुष्य दिखता है
मनुष्य का मन नहीं

अदृश्य को देख सकने वाले के पास मात्र दो ही विकल्प शेष रहते हैं
या तो वह पागल हो जाए
या कवि
कुछ होते हैं जो तीसरे विकल्प को तलाशते हुए जीवन गुजार देते हैं
और वे न पागल हो पाते हैं न कवि

तो साथियो, दुआ करूंगी कि आपका जीवन अधूरा न रहे, संपूर्ण पृथ्वी को घर बना लेने के बाद भी आप बेघर न रहें, यानी आपके जीवन में प्यार भरा पूरा रहे. इन्हीं कामनाओं के साथ आज आपसे विदा लेती हूं. अगली बार फिर मिलूंगी किसी और रचनाकार के साथ. पूजा प्रसाद को इजाज़त दीजिए. नमस्कार.​





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