Thursday, June 24, 2021
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Bihar Champaran Meat will get GI Tag soon viv– News18 Hindi


(विवेक कुमार पांडेय)

बिहार (Bihar) के अलग-अलग खाने आज देशभर में अपना परचम लहरा रहे हैं. लेकिन, एक डिश ऐसी है जिसने पिछले कुछ सालों में लोगों का खासा ध्यान खींचा है. हालांकि यह मांसाहार करने वालों की डिश है. जी हां, मैं बात कर रहा हूं ‘चंपारण मीट’ की. खुशी की बात यह है कि अब इस चंपारण मीट को जीआई टैग (GI Tag) मिलने जा रहा है. देश ही नहीं दुनिया में इस मीट ने अपनी खास जगह बनाई है.

नाम में ही सब रखा है

जीआई टैग को लेकर सबसे बड़ी लड़ाई के बारे में तो आपने सुना ही होगा. हां वही रसगुल्ले की लड़ाई, जिस पर बंगाल और उड़ीसा दोनों ने दावा ठोका था. लेकिन, इस बार चंपारण मीट को लेकर कोई विवाद नहीं है क्योंकि इसका नाम ही ऐसा है कि इसमें कोई विवाद हो ही नहीं सकता यानी यह मीट चंपारण से ही निकल देश और दुनिया में फैली है.

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यह होता है जीआई टैग

GI Tag यानी Geographical Indicator (भौगोलिक संकेतक). यह उन प्रोडक्ट को मिलता है, जिनका एक खास भौगोलिक मूल क्षेत्र होता है. जीआई टैग उस उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी विशेषता को दर्शाता है. इस उपलब्धि के बाद बिहार में और बिहारी लोगों के लिए बाहर में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. साथ ही चंपारण मीट को अब ज्यादा जिम्मेदारी से बनाया जाएगा.

अब थोड़ा खाने के बारे में जान लें

चंपारण मटन को अहुना, हांडी मीट या बटलोही मीट भी कहा जाता है. इस डिश की जड़ें चंपारण में ही हैं. हालांकि, बिहार का यह हिस्सा नेपाल से लगता है और बताया जाता है कि इसका इजाद वहां के हांडी मटन से ही हुआ. नेपाल में यह मीट खुले बर्तन में बनता है जबकि चंपारण में इसे मटकी में ढककर उसपर आटे से सील लगा दिया जाता है.

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बनाने का तरीका भी लाजवाब है

यह मीट बनाने का तरीका आम मटन की डिशेज से अलग है. इसमें मांस में सरसों का तेल, घी, लहसुन, प्याज, अदरख और मसालों का पेस्ट मिलाया जाता है. इसके बाद मटके में डाल कर उसे सील कर देते हैं. धीमी आंच पर इसे हिला-हिला कर पकाया जाता है. चार से पांच किलो मीट बनने में एक घंटे तक का समय लग जाता है. हालांकि, मीट की क्वालिटी इसके सही टेस्ट के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है. तो अगर आपने अभी तक चंपारण मीट का स्वाद नहीं चखा है तो जल्दी करिए. दिल्ली-एनसीआर में भी कई ठिकाने हैं इसके…



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