LinkedIn data of over 700 million users listed online for sale: Report | इसमें फोन नंबर, एड्रेस, सैलरी की डिटेल शामिल; हैकर्स ने इसे बेचने के लिए डार्क वेबसाइट पर डाला

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LinkedIn data of over 700 million users listed online for sale: Report | इसमें फोन नंबर, एड्रेस, सैलरी की डिटेल शामिल; हैकर्स ने इसे बेचने के लिए डार्क वेबसाइट पर डाला


नई दिल्ली28 मिनट पहले

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आप लिंक्डइन (LinkedIn) प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं, तब आपको अलर्ट रहने की जरूरत है। दरअसल, लिंक्डइन के 700 मिलियन (70 करोड़) से ज्यादा यूजर्स का डेटा लीक होने की खबर है। लीक में लिंक्डइन के करीब 92 फीसदी यूजर्स के डेटा शामिल हैं। इसमें यूजर्स का फोन नंबर, एड्रेस, लोकेशन और सैलरी जैसी निजी जानकारी की डिटेल शामिल है। डेटा का डार्क वेबसाइट पर बेचा जा रहा है।

जानकारी के मुताबिक, सभी यूजर्स की लिंक्डइन से जुड़ी डिटेल डार्क वेब पर बेची जा रही है। हैकर्स ने डार्क वेब के पब्लिक डोमेन में एक मिलियन यूजर्स का डेटा पोस्ट किया है। हालांकि, डेटा लीक करने वाले हैकर्स की जानकारी सामने नहीं आई है।

हैकर्स ने API के जरिए चुराया डेटा
9to5Google ने डेटा लीक को लेकर हैकर्स से संपर्क किया है। हैकर्स ने बताया है कि उसने LinkedIn API के जरिए इस डेटा को निकाला है। लीक डाटा सीट में यूजर्स के पासवर्ड शामिल नहीं हैं। इस प्लेटफॉर्म से जुड़े सभी यूजर्स अपने अकाउंट की जांच कर लें। साथ ही, अपने पासवर्ड को भी रिसेट कर लें।

लिंक्डइन ने डेटा चोरी की बात गलत बताई
डेटा के लीक होने की जानकारी RestorePrivacy द्वारा सबसे पहले दी गई है। हालांकि, लिंक्डइन ने डेटा लीक होने की बात को गलत बताया है। उसका कहना है कि यह डेटा नेटवर्क स्क्रैप करके निकाला गया है। इसके बाद भी वो मामले की जांच कर रही है। लिंकडिन ने शुरुआती जांच के बाद कहा है कि किसी लिंकडिन मेंबर का निजी डेटा लीक नहीं हुआ है। कंपनी का कहना है कि डेटा स्क्रैप करना लिंक्डइन की प्राइवेसी पॉलिसी का उल्लंघन है।

अप्रैल में 50 करोड़ यूजर्स के डेटा लीक हुआ था इसी साल अप्रैल में लिंक्डइन ने 500 मिलियन (50 करोड़) यूजर्स के डेटा लीक की बात स्वीकर की थी। तब लीग हुए डेटा में यूजर्स का ई-मेल एड्रेस, मोबाइल नंबर, पूरा नाम, अकाउंट आईडी, सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी समेत ऑफिस की डिटेल शामिल थी।

क्या होता है डार्क वेब?
इंटरनेट पर ऐसी कई वेबसाइट हैं जो ज्यादातर इस्तेमाल होने वाले गूगल, बिंग जैसे सर्च इंजन और सामान्य ब्राउजिंग के दायरे में नहीं आती। इन्हें डार्क नेट या डीप नेट कहा जाता है। इस तरह की वेबसाइट्स तक स्पेसिफिक ऑथराइजेशन प्रॉसेस, सॉफ्टवेयर और कॉन्फिग्रेशन के मदद से पहुंचा जा सकता है सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 देश में सभी प्रकार के प्रचलित साइबर अपराधों को संबोधित करने के लिए वैधानिक रूपरेखा प्रदान करता है। ऐसे अपराधों के नोटिस में आने पर कानून प्रवर्तन एजेंसियां इस कानून के अनुसार ही कार्रवाई करती हैं।

इंटरनेट एक्सेस के तीन पार्ट
1. सरफेस वेब : इस पार्ट का इस्तेमाल डेली किया जाता है। जैसे, गूगल या याहू जैसे सर्च इंजन पर की जाने वाली सर्चिंग से मिलने वाले रिजल्ट। ऐसी वेबसाइट सर्च इंजन द्वारा इंडेक्स की जाती है। इन तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।
2. डीप वेब : इन तक सर्च इंजन के रिजल्ट से नहीं पहुंचा जा सकता। डीप वेब के किसी डॉक्यूमेंट तक पहुंचने के लिए उसके URL एड्रेस पर जाकर लॉगइन करना होता है। जिसके लिए पासवर्ड और यूजर नेम का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें अकाउंट, ब्लॉगिंग या अन्य वेबसाइट शामिल हैं।
3. डार्क वेब : ये इंटरनेट सर्चिंग का ही हिस्सा है, लेकिन इसे सामान्य रूप से सर्च इंजन पर नहीं ढूंढा जा सकता। इस तरह की साइट को खोलने के लिए विशेष तरह के ब्राउजर की जरूरत होती है, जिसे टोर कहते हैं। डार्क वेब की साइट को टोर एन्क्रिप्शन टूल की मदद से छुपा दिया जाता है। ऐसे में कोई यूजर्स इन तक गलत तरीके से पहुंचता है तो उसका डेटा चोरी होने का खतरा हो जाता है।

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