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PUBG Murder: क्‍या कोरोना के बाद धैर्य खो रहे हैं बच्‍चे और बड़े? विशेषज्ञों ने दिया ये जवाब


नई दिल्‍ली. हाल ही में पबजी गेम (PUBG Game) खेलने से मना करने पर एक नाबालिग बेटे ने गोली मारकर मां की हत्‍या कर दी. लखनऊ में हुए इस हत्‍याकांड के बारे में जिसने भी सुना वह अवाक रह गया. आखिर कैसे कोई बेटा गेम खेलने को लेकर अपनी मां की हत्‍या (Murder) कर सकता है. वहीं इसके उलट एक घटना दिल्‍ली के खजूरी खास इलाके में हुई जहां एक मां ने होमवर्क न करने पर अपनी 5 साल की बेटी को हाथ-पैर बांधकर चिलचिलाती धूप में छत पर पटक दिया. जिसने भी छत पर पड़ी बच्‍ची की वह तस्‍वीर देखी सहम गया. ऐसी घटनाओं के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि बच्‍चे और बड़े आखिर इतने असंवेदनशील क्‍यों हो रहे हैं ? समाज में आ रहे इस बदलाव के लिए कौन सी चीजें जिम्‍मेदार हैं?

न्‍यूज18 हिंदी ने खासतौर पर बच्‍चों और बड़ों को लेकर जानी-मानी मनोचिकित्‍सक डॉ. निशा खन्‍ना और दिल्‍ली पेरेंट्स एसोसिएशन की अध्‍यक्ष अपराजिता गौतम से बातचीत की हैं. जिनका मानना है कि पिछले कुछ समय से ऐसी घटनाओं में बढ़ोत्‍तरी देखी जा रही है. अपराधों की घटनाओं पर गौर करें तो अधिकांश मामलों में बेहद निजी रिश्‍ते, मां, पिता, बेटा, बेटी, भाई या बहन जैसे लोग हत्‍या जैसी वारदातों में शामिल मिल रहे हैं. आखिर क्‍या वजह है कि बेहद निजी और प्रिय रिश्‍तों में ऐसी समस्‍या देखने को मिल रही है.

इस बारे में मनोचिकित्‍सक डॉ. निशा खन्‍ना कहती हैं कि पबजी खेलने को लेकर मां की हत्‍या करने वाले बच्‍चे की मनोस्थिति को देखा जाए तो ऐसा लग रहा है कि यह खीझ और गुस्‍से का सुप्रीम स्‍तर है और इसके लिए कोई एक चीज जिम्‍मेदार नहीं है, बल्कि पालन पोषण से लेकर कई फैक्‍टर जिम्‍मेदार होते हैं. इनमें परिवार का माहौल, माता-पिता का बच्‍चे के प्रति व्‍यवहार, बच्‍चे को समझना, बच्‍चे की संगत, पबजी जैसे गेम का बच्‍चे के दिमाग पर असर, टीवी, फोन की लत, सिनेमा या बेव सीरीजों में दिखाए जाने वाले क्राइम सीन आदि हैं. ज्‍यादातर मामलों में बच्‍चे अपने मन मुताबिक काम न होने, लंबे समय से चली आ रही खीझ और गुस्‍से के चलते, माता पिता के रवैये के चलते इस स्थिति तक पहुंच जाते हैं और ऐसे खतरनाक कदम उठा लेते हैं.

सिर्फ बच्‍चे नहीं बड़ों का भी धैर्य हो रहा खत्‍म
वहीं डीपीए की अध्‍यक्ष अपराजिता कहती हैं कि पबजी जैसे युद्ध और गोलीबारी वाले गेम तो इन घटनाओं के लिए बड़े रूप में जिम्‍मेदार हैं ही साथ-साथ आजकल जो जीवन से धैर्य खत्‍म हो रहा है, वह भी इन घटनाओं का एक बड़ा कारण है. सिर्फ बच्‍चे ही नहीं बल्कि बड़ों में भी अगर देखें तो धैर्य और सहनशीलता बहुत कम रह गई है. इसे ऐसे समझ सकते हैं, पहले सफर करने के लिए लोग बसों, टैक्सियों का घंटों खड़े होकर इंतजार कर लेते थे लेकिन अब मेट्रो ट्रेन अगर 5 मिनट भी लेट हो जाए तो लोग धैर्य खो देते हैं. यह तो सिर्फ एक उदाहरण है लेकिन यही चीज हमारे अंदर भरती जा रही है और फिर यह धैर्य और असहनशीलता जीवन के अन्‍य हिस्‍सों में दिखाई देने लगती है.

अपराजिता कहती हैं कि पबजी वाले मामले में एक 16 साल के लड़के ने हत्‍या की है. यहां बच्‍चे ने तो अपराध किया ही है लेकिन यहां माता-पिता की भी थोड़ी गलती है. यह एकाएक नहीं है. माता-पिता को उसका बदलता हुआ स्‍वभाव जरूर नजर आया होगा. लेकिन उन्‍होंने नोटिस नहीं किया और समय पर कोई कदम नहीं उठाया. लिहाजा ये घटना हुई. चीजों को इग्‍नोर करना सही नहीं है. यह वह उम्र होती है जब बच्‍चों में न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक बदलाव भी होते हैं, ऐसे में परिजनों को इसे समझने की जरूरत है. वहीं धैर्य खत्‍म होने और सहन न कर पाने के चलते आज बच्‍चे ही नहीं बल्कि बड़े भी खौफनाक कदम उठा रहे हैं. कई बार हम अपने रोते बच्‍चों को चुप करने के लिए या अगर व्‍यस्‍त हैं तो उन्‍हें बहलाने के लिए फोन दे देते हैं, यही बच्‍चों की आदत बन जाता है और फिर बिना उन्‍हें विकल्‍प उपलब्‍ध कराए, उनसे इस माध्‍यम को छुड़ाने के लिए कदम उठाते हैं तो यह नुकसानदेह हो जाता है.

क्‍या कोरोना के चलते बच्‍चों पर पड़ रहा ये असर
डॉ. निशा कहती हैं कि कोरोना के बाद से बच्‍चों का मोबाइल फोन पर समय काफी ज्‍यादा हो गया है. उनका स्‍क्रीन टाइम बाकी अन्‍य चीजों के मुकाबले बढ़ गया है. घरों से बाहर न जाने और घरों के अंदर ही रहकर ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान फिर बच्‍चे इंटरनेट पर मौजूद गेम्‍स या अन्‍य चीजों के प्रति भी आकर्षित हुए. दो साल के इस लंबे पीरियड में बच्‍चों को फोन की लत लग गई. न कोविड के दौरान बल्कि अभी भी पेरेंट्स फोन देकर बच्‍चों के प्रति निश्चिंत हो गए. जबकि बच्‍चों की निगरानी की बड़ी जरूरत थी और है भी. अभिभावकों को चाहिए कि बच्‍चा इंटरनेट पर क्‍या देख रहा है इसकी पूरी पड़ताल करें, जानकारी करें. बच्‍चों को लॉजिक देकर चीजों को समझाएं, बजाय सीधे मना करने के. बच्‍चे समझेंगे.

वहीं अपराजिता कहती हैं कि कोरोना के एक लंबे समय का बच्‍चों और बड़ों के मन पर काफी असर पड़ा है. यहां तक कि पूरा समाज ही अब उस काल में पैदा हुई परेशानियों से जूझ रहा है. यहां पेरेंट्स को बहुत स्‍मार्ट तरीके से बच्चों को डील करने की जरूरत है. बारीकी से बच्‍चों पर नजर रखने और प्‍यार से समझाने की जरूरत है.

कोरोना काल में आए ऐसे-ऐसे मामले
डॉ. निशा बताती हैं कि कोरोना के दौरान उनके पास कई ऐसे बच्‍चे आए जो अपने मां या बाप में से किसी का कत्‍ल कर देना चाहते थे. निशा बताती हैं, ‘कोरोना काल में मेरे पास एक लड़का आया, जिसने कहा कि उसके पापा ने उसे बिजनेस में लगाने के लिए पैसे नहीं दिए क्‍योंकि उन्‍हें बिजनेस का उसका आइडिया पसंद नहीं है. जबकि अपने शौक और एशो-आराम पर खर्च कर रहे हैं, उसने कहा कि उसका मन करता है कि पापा को मार दे.’ निशा आगे बताती हैं कि कोरोना के दौरान एक बच्‍चे की मां की मृत्‍यू हो गई, वह बच्‍चा काउंसिलिंग के लिए आया, उसने कहा, ‘ मेरी मां जिन्‍दा रहती, पापा मर जाते. ‘ निशा कहती हैं कि बच्‍चों की ये बातें हैरान करने वाली थीं लेकिन कोरोना के दौरान एक साथ रहने और बच्‍चों पर पेरेंट्स में सामंजस्‍य न होने का ये परिणाम रहा.

Tags: Butal murder, Pubg, PUBG game



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